''Antardrishti Forum for Friends of Blind '' का गठन होगा''अन्तरदृष्टि फोरम फॉर फ्रेंण्डस ऑफ ब्लाइंड '' का गठन होगा आगरा। आज दिनांक 7 फरवरी 2010 को अपरहान 3.30 पर अंतरदृष्टि द्वारा दृष्टिहीनों की समस्यओं और उनके समाधान पर एक परिचर्चा का आयोजन दिल्ली गेट स्थित गोवर्धन होटल में किया गया। श्री श्रीधर उपाध्याय (दृष्टिहीन) ने परिचर्चा के उद्देश्यों को बताते हुए कार्यक्रम की शुरूआत की। सहभागियों का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि आगरा जैसे विकसित शहर में दृष्टिहीनों की स्थिति बहुत ही दयनीय है। समाज या तो उन्हें दया का पात्र मानता है या फिर किसी काम का नहीं। पढ़ाई लिखाई हो जाने के बाद भी रोजगार के साधन लगभग न के बराबर है। जानकारी और संसाधनों तक पहुंच न होने के कारण भी दृष्टिहीनों के एक बड़े तबके को विभिन्न सरकारी - गैरसरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता है, ऐसी स्थिति में किस तरह से बदलाव लाया जा सकता है को जानने के उद्देश्य से ही इस बैठक का आयोजन किया गया है। ![]() परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए अखिल श्रीवास्तव ने कहा कि दृष्टिहीनों की वर्तमान स्थिति पर यदि एक नजर डाली जाये तो यह कहने में कोई संकोच नहीं होगा कि आजादी के 60 वर्षो के बाद भी दृष्टिहीनों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने में हम असफल रहें हैं। 30 प्रतिशत से भी ज्यादा दृष्टिहीन शहरी क्षेत्र में रहते है। यदि दृष्टिहीन विद्यालयों मे रहने वाले दृष्टिहीनों को छोड़ दिया जाये तो शायद ही आपको कभी कोई दृष्टिहीन सड़क पर चलते हुए या किसी सामाजिक गतिविधि में भाग लेते हुए मिले। कभी देखा है आपने इन्हें स्कूल, कालेज, बैंक, पोस्ट-ऑफिस या किसी अन्य सार्वजनिक सुविधाओं का इस्तेमाल करते हुए। क्या कारण है कि ये लोग शहर में रहते हैं, फिर भी दिखाई नहीं दे। ऐसा लगता है मानों किसी ने इनको समाज से काट कर अलग-थलग कर दिया हो। आज भी दृष्टिहीनों को समाज में दया या घृणा का पात्र माना जाता है। दृष्टिहीनों को एक अशक्त वर्ग समझ कर दया और दान का पात्र समझा गया है। लेकिन सत्य यह है कि दृष्टिहीनों की आकांक्षाओं को न तो समाज ने और न ही सरकार ने सही रूप में समझा है। जहां समाज ने उन पर दया उड़ेंली है वही सरकारों ने उन्हें कुछ कामों तक ही सीमित कर दिया। हमारे लिए दृष्टिहीन न तो उपेक्षा के पात्र है और न दया किये जाने वाले 'बेचारे'। शरीर के दूसरे किसी भी रोग की तरह दृष्टिहीनता भी एक रोग है जिसके रोगी को उपेक्षा, घृणा और दया के बजाय सहयोग और बराबरी का भाव पैदा करने की जरूरत होती है। उन्होंने आगे कहा कि अंतरदृष्टि की यह स्पष्ट अवधारणा है कि दृष्टिहीनों के प्रति समाज को जागरूक बनाने के साथ ही साथ दृष्टिहीनों को समान अवसर और कौशल दिलाकर तथा उत्पादन की प्रक्रियाओं या उनके सक्रिय योगदान के लिए स्थान उपलब्ध कराके ही इन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जा सकता है। साथ ही साथ यह भी जरूरी है कि समाज का वह तबका जो कि किसी न किसी रूप से दृष्टिहीनों के जीवन को प्रभावित करता है इनकी मौजूदगी को न सिर्फ स्वीकार करे बल्कि इनके साथ सम्मान व बराबरी का बर्ताव भी करें। विगत 6 वर्षो से जारी अपने हस्तक्षेपों से प्राप्त अनुभवों का गहन विश्लेषण करने के बाद हमने एक ऐसे मंच की जरूरत महसूस की जहां पर दृष्टिहीनों के साथ - साथ उनके परीवारी जन, मित्र, व विभिन्न समुदाय के लोग आपस में विचार-विमर्श, अनुभवों का आदान-प्रदान व एक दूसरे को सहयोग के द्वारा दृष्टिहीनों की समस्याओं का न सिर्फ समाधान कर सके, बल्कि दृष्टिहीनों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ सकें। आगरा विश्वविद्यालय में कुर्सी बुनकर के पद पर कार्यरत रघुनाथ जी (दृष्टिहीन) ने भी आखिल श्रीवास्तव द्वारा कही गई बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि वह भी पिछले कई सालो से इस तरह के एक मंच की कमी महसूस कर रहे थे, लेकिन सहयोग न मिल पाने के मंच का गठन नहीं कर पाये। परिचर्चा में उपस्थित सभी लोग इस बात से सहमत थे कि इस तरह के एक मंच की जरूरत है जो न सिर्फ उनकी समस्याओं का समाधान करने में उनकी मदद करे बल्कि उनको समाज में सम्मान और बराबरी का दर्जा दिला सके। मनोहर लाल गिदवानी ने इस बात पर खुशी जताते हुए कहा कि यह एक अच्छा कांसेप्ट होगा और इसकी जरूरत भी है, क्योंकि समाज में आज भी दृष्टिहीनों को दया का पात्र माना जाता है, यह फोरम समाज को इस बात के लिए जागरूक करने में सहायक होगा कि दृष्टिहीन दया के पात्र नहीं है बल्कि उनको सही प्रशिक्षण और मौंकों की जरूरत है ताकि वो भी आत्मनिर्भर हो सकें। मंजू उपाध्याय (दृष्टिहीन) ने भी मंच बनाने की जरूरत पर बल दिया और कहां कि अभी तक आगरा में दृष्टिहीन लड़कियों के लिए किसी भी तरह की कोई सुविधा नहीं थी लेकिन अंतरदृष्टि द्वारा किये जा रहे प्रयासों से अब यहां की लड़कियां भी पढा़ई कर सकेंगी और इस मंच के माध्यम से अपनी समस्याओं का समाधान कर सकेगीं। सिप्पी (दृष्टिहीन बालिका) ने इस बात पे खुशी जताई कि आज वो पहली बार अपने जैसे कई सारे दृष्टिहीनों के साथ बैठ के पहली बार बात कर रही है और मंच के बनने की प्रक्रिया में वो भी शामिल है। उसके पिता श्री ब्रजेश जी ने कहां कि वो आगरा में पिछले 4 साल से रह रहे है लेकिन पहली बार उनहें किसी ऐसे कार्यक्रम में शामिल होने का मौका मिला है जहां पर दृष्टिहीनों भलाई के लिए बातचीत हो रहीं है। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि आज उन्हें बहुत खुशी है कि उनकी बेटी को आगे बढ़ाने में वो अकेले नहीं है, पूरा समाज उनके साथ है। इसके बाद मंच का नाम क्या हो इस पर चर्चा शुरू हुई और अखिल श्रीवास्तव ने एक नाम ''अन्तरदृष्टि फोरम फॉर फ्रेंण्डस ऑफ ब्लाइंड '' (Antardrishti Forum for Friends of Blind) सुझाया, जिसका परिचर्चा में उपस्थित सभी लोगों ने स्वागत करते हुए कहां कि यही ठीक रहेगा। तत्तपश्चात फोरम का गठन कैसे हो, किन लोगो को इसमे शामिल किया जाये, कैसे काम करेगा आदि महत्वपूर्ण बातो पर यह तय किया गया कि जैसे - जैसे फोरम की गतिविधियां आगे बढ़ेगी इन प्रश्नों का भी जवाब मिलता जायेगा। इस बात पर सभी लोग एक मत थे कि फोरम में दृष्टिहीन और दृष्टि वाले दोनो ही तरह के लोगों को शामिल किया जायेगा और शुरूआत में फोरम का संचालन करने हेतु 9 लोगों की एक टीम बनाई जाये जिसमें 5 दृष्टिहीन और 4 सामान्य व्यक्तियों को शामिल किया जाये। जयकरन (दृष्टिहीन) ने यह सुझाव रखा कि मंच में शामिल होने वाले सदस्यओं से कुछ न कुछ फीस अवश्य ली जाये, साथ में उन्होंने यह भी कहा कि जो सदस्य अपने पैरो पर खड़े हो चुके है उनकी यह जिम्मेदारी ज्यादा मजबूती से लेनी चाहिए ताकि दृष्टिहीनों को भी समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जा सके। अम्बरीषपुरी (दृष्टिहीन) ने जयकरन की बातो से सहमती जताते हुए कहा कि किसी भी संगठन को चलाने के लिए पैसो की जरूरत होती है और हम लोगों को चाहिए कि स्वयं ही पैसों का इंतजाम करें बजाय इसके कि दूसरों से भीख मांगी जाये। उन्होंने यह भी कहां कि हम दृष्टिहीनों को दया और दान नहीं चाहिएं हमें चाहिए सही प्रशिक्षण और भेदभाव रहित समाज ताकि हम लोग भी आत्मनिर्भर हो सकें। बातचीत के दौरान निम्न मुख्य उद्देश्य सामने आये - संयुक्त बैठकों, गोष्ठियों, सेमीनार्स तथा कार्यशालाओं के माध्यम से संवाद कायम करना तथा -
आगामी 21 फरवरी 2010 को एक बड़ी बैठक बुला कर उसमें फोरम के गठन की घोषणा करने और विधिवत रूप से शुरू करने पर सहमति बनी और अंत में श्रीधर उपाध्याय ने सभी सहभागियों को धन्यवाद दिया। |
Braille class for Blind Girls in Agra by Antardrishtiआगरा। आज दिनांक 3 दिसंबर 2009 को अंतरदृष्टि द्वारा विश्व विकलांग दिवस के अवसर पर हरिपर्वत स्थित क्वीन विक्टोरिया गर्लस इंटर कालेज के रेड क्रास भवन में प्रातः 12 बजे दृष्टिहीन लड़कियों और बच्चों के लिए ब्रेल की कक्षाओं की शुरूआत हुई। इस अवसर पर श्रीधर उपाध्याय (दृष्टिहीन) ने दृष्टिहीन लड़कियों विकलांग दिवस के महत्व को समझाते हुए बताया कि यदि ठान लिया जाये तो कुछ भी असंभव नही हैं। कुछ पाने के लिए मेहनत करनी पड़ती है और यह बात दृष्टिहीनों और अन्य विकलांगजनों पर भी लागू होती है। अंतरदृष्टि के अखिल श्रीवास्तव ने सभी सहभागियों का स्वागत करते हुए बताया कि ब्रेल दृष्टिहीनो को आत्मनिर्भर बनने में मदद करता है, साथ ही उन्होंने कहां कि दृष्टिहीन भी सामान्य लोगों की तरह अपना जीवन जी सकते है, बस जरूरत इस बात की है कि दृष्टिहीन पढ़ाई के साथ-साथ अपने व्यक्तिव का निर्माण भी करें ताकि समाज के अन्य लोगों के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल सके। ![]() श्रीधर उपाध्याय, सिप्पी को ब्रेल स्लेट की बारिकियों को बताते हुए click here to see more photo शिवानी (दृष्टिहीन) ने कहा कि एक सेंटर खोला जाना चाहिए जिसमें दृष्टिहीन युवक युवतियों को रोजगारोपयोगी प्रशिक्षण दिया जा सके। आज हमारे देश में विकलांगों को शिक्षा तो मिल रही है लेकिन रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं है। आगरा जिले में दृष्टिहीनों के लिए एक हास्टल खोले जाने की भी जरूरत महसूस की गई। यदि शहर में हास्टल होगा तो दृष्टिहीनों के लिए जो थोड़े बहुत अवसर अंतरदृष्टि के प्रयासों से उपलब्ध है उनका उपयोग हो सकेगा और दृष्टिहीनों को भी रोजगार मिल सकेगा। क्वीन विक्टोरिया गर्लस इंटर कालेज में दृष्टिहीन लड़कियों के ब्रेल की शिक्षा शुरू होने को स्वागत करते हुए शिल्पी (दृष्टिहीन) ने कहॅां कि आगरा में इसकी बहुत जरूरत थी, क्योंकि यहां पर लड़कियों के लिए किसी भी प्रकार की सुविधा उपलब्ध नहीं है। मंजू उपाध्याय (दृष्टिहीन) ने कहां कि आज दृष्टिहीन लड़किया सारा काम खुद से कर लेती है, चाहे खाना बनाना हो या पढ़ाई करना हो। उन्होंने साथ में भी यही सुझाव दिया की मीडिया के माध्यम से ज्यादा से ज्यादा दृष्टिहीन लड़कियों को इस तरह के कार्यक्रम से जोड़ा जाये ताकि उनकी भी पढ़ाई ठीक तरह से हो सके। शिवानी जिनकों क्रोशिया की बुनाई और खिलौनों को बनाने में दक्षता हासिल है अपनी बनाई हुई वस्तुओं को दिखाते हुए कहा कि आज उन्हें अपने जैसी दूसरी दृष्टिहीन लड़कियों से मिल कर बड़ी खुशी हो रही है और वो इन दूसरी लड़कियों को भी इस कला को सिखाना चाहेगी। उन्होंने क्रोशिया और उन के द्वारा गणेश जी, कृष्ण भगवान के लिए कपड़े, दूध की बोतल का कवर आदि को भी सबको दिखाया। ![]() अपने द्वारा क्रोशिया की बुनाई से बनाई गई वस्तुओं को दूसरी दृष्टिहीन लड़कियों को दिखाते हुए शिवानी कार्यक्रम के अंत में श्रीधर उपाध्याय ने बताया कि कल से 12 बजे से 1 बजकर 30 मिनट तक हरिपर्वत स्थित क्वीन विक्टोरिया गर्लस इंटर कालेज के रेड क्रास भवन में दृष्टिहीन लड़कियों और बच्चों के लिए ब्रेल की कक्षाएं सोमवार से शुक्रवार तक चलेगी। जो दृष्टिहीन लड़कियां और बच्चे ब्रेल सिखना चाहते है वो कृप्या 09412258575, 09358396846 पर संपर्क करे। तत्पश्चात अखिल श्रीवास्तव ने श्रीमति मीनाक्षी दास, प्रधानाचार्य, क्वीन विक्टोरिया गर्लस इंटर कालेज का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके सहयोग के बिना इस तरह के कार्यक्रम को करना लगभग असंभव सा था। अंत में उपस्थित लोगों का धन्यवाद देते हुए कहा कि अंतरदृष्टि के पास 18 से 30 वर्ष की आयु वाले दृष्टिहीनों के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध है इच्छुक दृष्टिहीन 09412258575 पर संपर्क कर सकते हैं। |
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